अवगत नाथ निरंजन देवा, मैं क्या जानूँ थारी सेवा
BLOG
12/25/20251 मिनट पढ़ें
अवगत नाथ निरंजन देवा, मैं क्या जानूँ थारी सेवा।
अवगत नाथ निरंजन देवा, मैं क्या जानूँ थारी सेवा॥
बाँधूँ ना बंधन, छाया ना घाऊँ, सेवूँ निरंजन राया।
मैं क्या जानूँ थारी सेवा॥
अवगत नाथ निरंजन देवा, मैं क्या जानूँ थारी सेवा॥
चरण पाताल, शीश आसमाना, कैसे समेटूँ ठाकुर समाना।
मैं क्या जानूँ थारी सेवा॥
अवगत नाथ निरंजन देवा, मैं क्या जानूँ थारी सेवा॥
शिव शंकरादिक अंत न पाए, खोजत-खोजत जन्म गँवाए।
मैं क्या जानूँ थारी सेवा॥
अवगत नाथ निरंजन देवा, मैं क्या जानूँ थारी सेवा॥
होड़ूँ ना पाती, पूजूँ ना देवा, सहज समाधि करूँ हरि सेवा।
मैं क्या जानूँ थारी सेवा॥
अवगत नाथ निरंजन देवा, मैं क्या जानूँ थारी सेवा॥
कहे रविदास—जाके सुरसरी धारा,रोम-रोम ठारा है भारा।
मैं क्या जानूँ थारी सेवा॥
अवगत नाथ निरंजन देवा, मैं क्या जानूँ थारी सेवा॥
🌿 निर्गुण दर्शन का मूल भाव
निर्गुण दर्शन कहता है— ईश्वर रूप, रंग, नाम, सीमा और कर्मकांड से परे है। उसे पूजा से नहीं, सहज बोध (सहज समाधि) से जाना जाता है।
यह भजन अहंकार-शून्य भक्ति का घोष है।
“अवगत नाथ निरंजन देवा, मैं क्या जानूँ थारी सेवा”
अवगत = जो सब जानता है
निरंजन = जो माया से अछूता है
👉 भक्त कहता है: “हे प्रभु! तू सब जानता है, मैं नहीं जानता कि तेरी सेवा कैसे करूँ।”
🔹 यह कथन अज्ञान की स्वीकारोक्ति नहीं,
🔹 बल्कि अहंकार का विसर्जन है।
निर्गुण में सबसे पहली सेवा है — ‘मैं कुछ नहीं जानता’ कहना।
“बाँधूँ ना बंधन, छाया ना घाऊँ, सेवूँ निरंजन राया”
यहाँ कर्मकांड का निषेध है।
ना फूल-माला बाँधता हूँ
ना धूप-छाया करता हूँ
👉 क्योंकि निरंजन किसी बाहरी सेवा से प्रसन्न नहीं होता।
🔹 सच्ची सेवा = मन का निर्मल होना
“चरण पाताल, शीश आसमाना, कैसे समेटूँ ठाकुर समाना”
यहाँ ईश्वर की असीमता का बोध है।
चरण = पाताल में
शीश = आकाश में
👉 ऐसा प्रभु किसी मंदिर या मूर्ति में कैसे समाए?
🔹 यह पंक्ति कहती है—जो अनंत है, उसे सीमित रूप में पकड़ना असंभव है।
“शिव शंकरादिक अंत न पाए, खोजत-खोजत जन्म गँवाए”
यह बहुत गूढ़ कथन है।
👉 जब शिव जैसे देव भी उसका अंत नहीं पा सके,
👉 तो साधारण मनुष्य कैसे पा सकता है?
🔹 संदेश स्पष्ट है: खोज से नहीं, छोड़ने से मिलता है।
“होड़ूँ ना पाती, पूजूँ ना देवा, सहज समाधि करूँ हरि सेवा”
यह निर्गुण दर्शन की कुंजी पंक्ति है।
ना पाती (चिट्ठी, याचना)
ना पूजा-पाठ
ना देवताओं की मूर्तियाँ
👉 केवल सहज समाधि।
🔹 सहज समाधि = बिना प्रयास, बिना दिखावे, भीतर की मौन जागरूकता।
“कहे रविदास—जाके सुरसरी धारा, रोम-रोम ठारा है भारा”
सुरसरी धारा = भीतर बहने वाली चेतना की गंगा
👉 जब यह धारा जागती है,
👉 तो शरीर का हर रोम ईश्वर से भर जाता है।
🔹 तब पूजा बाहर नहीं,
🔹 पूरा जीवन ही पूजा बन जाता है।
भजन का अंतिम रहस्य
यह भजन कहता है:
“मैं तेरी सेवा नहीं जानता,
और यही मेरी सबसे बड़ी सेवा है।”
क्योंकि जहाँ ‘मैं’ समाप्त,
वहीं निरंजन प्रकट।
🌌 कहानी: “मैं क्या जानूँ थारी सेवा”
एक बार की बात है। एक यात्री था—नाम नहीं था उसका। क्योंकि जिसने नाम छोड़ दिया, वह नाम का क्या करे। वह बहुत दिनों से एक प्रश्न लेकर भटक रहा था—“मैं ईश्वर की सेवा कैसे करूँ?”
उसने मंदिरों की सीढ़ियाँ घिस दीं, मस्जिदों के फर्श से माथा रगड़ा, तीर्थों में देह धोई—पर भीतर की प्यास जस की तस रही। एक रात वह थक कर नदी किनारे बैठ गया। आकाश में चाँद था, पानी में उसका प्रतिबिंब।
यात्री बोला—“अवगत नाथ निरंजन देवा, मैं क्या जानूँ थारी सेवा?”
हवा में कोई आवाज़ नहीं आई। लेकिन मौन ने उसे सुन लिया।
🌿 बंधन तोड़े गए
अगले दिन उसने फूल, धूप, माला सब छोड़ दिए।
बोला—“ना बाँधूँ बंधन, ना छाया घाऊँ, कैसे सेवा करूँ उस निरंजन राया की जिसे बाँधा ही नहीं जा सकता?”
उसने देखा—ईश्वर न मंदिर में कैद है, न मूर्ति में।
🌌 अनंत का डर
एक दिन किसी ने कहा— “वह पाताल में भी है, और आसमान में भी।” यात्री काँप गया।
बोला— “जिसके चरण नीचे और शीश ऊपर हो, उसे मैं कैसे समेटूँ?”
उसी क्षण उसे समझ आया—डर ईश्वर का नहीं, डर उसे पकड़ने की कोशिश का है।
🔥 खोज का अंत
वह वर्षों खोजता रहा। शास्त्र पढ़े, वाद किए, तर्क लगाए। एक वृद्ध साधु ने हँसते हुए कहा—
“शिव भी जिसे न पाए, तू खोज-खोज कर अपने जन्म क्यों गँवा रहा है?” यात्री पहली बार चुप हुआ।
खोज बंद हुई। और उसी क्षण कुछ घटा।
🌊 सहज समाधि
अब वह ना कुछ माँगता था, ना किसी को पुकारता। बस बैठता। साँस को आता-जाता देखता।
एक दिन उसने पाया—भीतर कुछ बह रहा है। कोई गंगा, कोई सुरसुरी। वह रो पड़ा।
🌸 रोम-रोम की पूजा
अब उसे पूजा करनी नहीं पड़ती थी। उसका चलना पूजा था, उसका चुप रहना आरती। उसके रोम-रोम में
वही निरंजन ठहर गया था जिसे वह बाहर खोज रहा था।
उसने मुस्कुराकर कहा—“अवगत नाथ निरंजन देवा, मैं क्या जानूँ थारी सेवा।”
और पहली बार—यह वाक्य उत्तर बन गया।
✨ कहानी का गूढ़ अर्थ
ईश्वर सेवा से नहीं, सेवा करने वाले के मिटने से मिलता है।
खोज जितनी गहरी होती है, मिलना उतना ही दूर चला जाता है।
जब “मैं” चुप होता है, तभी निरंजन बोलता है।
हमारा उद्देश्य केवल सजगता बढ़ाना है ,हम जन साधारण को संतो, ध्यान विधियों ,ध्यान साधना से संबन्धित पुस्तकों के बारे मे जानकारी , इंटरनेट पर मौजूद सामग्री से जुटाते है । हम किसी धर्म ,संप्रदाय ,जाति , कुल ,या व्यक्ति विशेष की मान मर्यादा को ठेस नही पहुंचाते है । फिर भी जाने अनजाने , यदि किसी को कुछ सामग्री सही प्रतीत नही होती है , कृपया हमें सूचित करें । हम उस जानकारी को हटा देंगे ।
website पर संतो ,ध्यान विधियों , पुस्तकों के बारे मे केवल जानकारी दी गई है , यदि साधकों /पाठकों को ज्यादा जानना है ,तब संबन्धित संस्था ,संस्थान या किताब के लेखक से सम्पर्क करे ।
© 2024. All rights reserved.
