ज्ञान विचार, चरण चित्त लावे, हरि की शरण रहवे
BLOG
12/29/20251 मिनट पढ़ें
ज्ञान विचार, चरण चित्त लावे, हरि की शरण रहवे।
पाती तोड़े, पूज न रचावे, तारण-तरण कहवे॥
मूरत में ही वसे परम सूर, पानी में ही तरे॥
ज्ञान विचार, चरण चित्त लावे, हरि की शरण रहवे॥
तेरे बिन संसार कौन, तेरे बिन गुठन नाव गह।
नाव छोड़ दे तो डूब वसे, दूना दुख सहे॥
ज्ञान विचार, चरण चित्त लावे, हरि की शरण रहवे॥
गुरु-शब्द और सूरत कुदाली, खोदत कोई रहे।
राम कहूँ के ना वाड़े, आपे सोने कूल बहे॥
ज्ञान विचार, चरण चित्त लावे, हरि की शरण रहवे॥
झूठी माया जग बहकाया, तो तीन ताप दहे।
कहे रविदास—राम जप रसना, काहू का संग न रहे॥
ज्ञान विचार, चरण चित्त लावे, हरि की शरण रहवे॥
🌿 निर्गुण दर्शन : गूढ़ व्याख्या
(पद: “ज्ञान विचार, चरण चित्त लावे…”)
“रविदास जी कहे—ज्ञान विचार, चरण चित्त लावे, हरि की शरण रहवे।”
यहाँ ज्ञान का अर्थ शास्त्र-ज्ञान नहीं है।
यह है विवेक-बोध—जो असत्य को पहचान कर छोड़ दे।
चरण चित्त लाना =
मन को स्थिर कर सत्य में टिक जाना।
🔹 निर्गुण में शरण का अर्थ किसी रूप में नहीं, अहंकार के त्याग में है।
“पाती तोड़े, पूज न रचावे, तारण-तरण कहवे।”
यहाँ बाह्य पूजा का स्पष्ट निषेध है।
पाती (पत्र, निवेदन)
पूजन-विधि
दिखावटी साधना
👉 ये सब तरण नहीं, केवल मन को बहलाना हैं।
🔹 निर्गुण कहता है—जो स्वयं तरा हो, वही तारण है।
“मूरत में ही वसे परम सूर, पानी में ही तरे।”
यह बहुत गूढ़ प्रतीक है।
परम सूर = सर्वोच्च चेतना / प्रकाश
👉 चेतना हर रूप में है, पर उसी में तैरता है जो नाम-नाव पकड़ता है।
🔹 जल संसार है, तैरना जागरूकता है।
“तेरे बिन संसार कौन, तेरे बिन गुठन नाव गह।”
यहाँ नाम / शरण को नाव कहा गया है।
👉 बिना नाव के सागर पार नहीं होता, और बिना नाम के संसार से मुक्ति नहीं।
🔹 निर्गुण में नाव कोई वस्तु नहीं, भीतर की चेतना है।
“नाव छोड़ दे तो डूब वसे, दूना दुख सहे।”
जब साधक
अहंकार में लौटता है
या नाम-स्मरण छोड़ देता है
👉 तो दुःख दुगुना हो जाता है।
🔹 चेतना से गिरना मृत्यु से भी गहरा पतन है।
“गुरु-शब्द और सूरत कुदाली, खोदत कोई रहे।”
यह निर्गुण साधना की मुख्य विधि है।
गुरु-शब्द = सत्य-संकेत
सूरत = चेतना का प्रवाह
👉 दोनों मिलकर कुदाली बनते हैं जो भीतर के अज्ञान को खोदते हैं।
🔹 साधना = भीतर की खुदाई।
“राम कहूँ के ना वाड़े, आपे सोने कूल बहे।”
यहाँ राम किसी मूर्ति का नाम नहीं।
राम = जो स्वयं बहता है, जिसे रोका नहीं जा सकता।
👉 जहाँ कोई दावा नहीं, वहीं सत्य का प्रवाह है।
“झूठी माया जग बहकाया, तो तीन ताप दहे।“
माया = अज्ञान की चमक।
👉 इसके कारण तीन ताप जलाते हैं—शरीर, मन और चेतना।
🔹 निर्गुण में माया का अंत देखने से होता है, लड़ने से नहीं।
राम जप रसना,
काहू का संग न रहे।” यह अंतिम और अत्यंत सूक्ष्म संकेत है।
👉 जब नाम रसना पर उतरता है, तो संसार का सहारा छूट जाता है।
🔹 अकेलापन नहीं, पूर्णता आती है।
🌸 पद का अंतिम मर्म
ज्ञान = देखने की शक्ति
शरण = अहंकार का विसर्जन
गुरु = भीतर की खुदाई का औज़ार
जहाँ “मैं” समाप्त, वहीं निर्गुण राम प्रकट।
🌒 कहानी : “नाव”
एक साधक था।
उसके हाथ में ग्रंथ थे, होठों पर मंत्र, और आँखों में प्रश्न—“ज्ञान कहाँ है?”
वह हर दिन विचार करता, हर रात पूजा सजाता। पाती लिखता, दीये जलाता।
पर भीतर…कुछ पार नहीं हो रहा था।
🪔 गुरु का संकेत
एक दिन वह एक वृद्ध गुरु के पास पहुँचा।
बोला—“मैं बहुत पूजा करता हूँ, बहुत पढ़ता हूँ, फिर भी डूबा रहता हूँ।”
गुरु ने नदी की ओर इशारा किया—“क्या तैरना जानता है?”
साधक बोला—“नहीं।”
गुरु मुस्कुराए—“तो नाव पकड़।”
🌊 नाव का अर्थ
साधक ने चारों ओर देखा—न कोई लकड़ी, न कोई पतवार।
गुरु बोले—“यह नाव बाहर नहीं, तेरे भीतर है।
नाम को पकड़, विचार को थाम, और चित्त को चरणों में रख।”
✂️ बाहरी पूजा का त्याग
साधक ने धीरे-धीरे पाती लिखना छोड़ा, दिखावे की पूजा छोड़ी।
अब वह बैठता, साँस देखता, नाम को सुनता।
उसने जाना—परम प्रकाश मूर्ति में नहीं, हर क्षण में है।
🕳️ भीतर की खुदाई
गुरु बोले—“शब्द को कुदाली बना।”
साधक ने गुरु-वचन से अपने भीतर खोदना शुरू किया।
वहाँ डर मिला, अभिमान मिला, पर साथ ही— शांति की धारा भी।
🌞 बहाव
एक दिन उसने प्रयास छोड़ दिया। नाम स्वयं बहने लगा— जैसे नदी।
अब वह “राम” कहता नहीं था, राम होता था।
🔥 माया का जलना
माया अब भी आई, पर जलने लगी।
तीन ताप—तन, मन, समय—धीरे-धीरे शीतल हो गए।
🕊️ अंत नहीं, ठहराव
किसी ने पूछा—“अब तू किसके संग है?”
साधक बोला—“अब किसी के संग नहीं। अब जो है, वही संग है।”
नदी बहती रही। नाव स्थिर रही। और साधक… पार हो गया।
🌸 कहानी का मर्म
नाव छोड़ी, तो डूबे
नाम थामा, तो तरे
पूजा छोड़ी, उपस्थिति मिली
जहाँ विचार शांत, वहीं शरण।
हमारा उद्देश्य केवल सजगता बढ़ाना है ,हम जन साधारण को संतो, ध्यान विधियों ,ध्यान साधना से संबन्धित पुस्तकों के बारे मे जानकारी , इंटरनेट पर मौजूद सामग्री से जुटाते है । हम किसी धर्म ,संप्रदाय ,जाति , कुल ,या व्यक्ति विशेष की मान मर्यादा को ठेस नही पहुंचाते है । फिर भी जाने अनजाने , यदि किसी को कुछ सामग्री सही प्रतीत नही होती है , कृपया हमें सूचित करें । हम उस जानकारी को हटा देंगे ।
website पर संतो ,ध्यान विधियों , पुस्तकों के बारे मे केवल जानकारी दी गई है , यदि साधकों /पाठकों को ज्यादा जानना है ,तब संबन्धित संस्था ,संस्थान या किताब के लेखक से सम्पर्क करे ।
© 2024. All rights reserved.
