हँसी : चेतना की सात तरंगें — आत्मा से आत्मा तक
BLOG
1/27/20261 मिनट पढ़ें
हँसी : चेतना की सात तरंगें — आत्मा से आत्मा तक
मनुष्य की हँसी केवल मनोरंजन या भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है। यह चेतना की भाषा है—एक ऐसी भाषा जो शब्दों से पहले जन्म लेती है और मौन में विलीन हो जाती है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में हँसी को मन की स्थिति नहीं, बल्कि अंतरात्मा की गति माना गया है। जैसे-जैसे चेतना का विस्तार होता है, हँसी के रूप भी बदलते जाते हैं। यह हँसी सात स्तरों में प्रकट होती है—सीता से अतीहंसीता तक—और हर स्तर आत्मिक विकास की एक सीढ़ी है।
1. सीता — मौन में खिलती आत्मा की मुस्कान
सीता वह मुस्कान है जो दिखाई नहीं देती, बल्कि महसूस की जाती है।
यह चेहरे पर नहीं, चेतना में घटती है।
यह मुस्कान तभी देखी जा सकती है जब देखने वाला स्वयं सचेत हो।
यह उस साधक की मुस्कान है जिसने भीतर झाँकना सीख लिया है।
सीता मुस्कान कहती है — “सब ठीक है, जैसा है वैसा ही।”
यह हँसी नहीं, स्वीकृति है।
यह बुद्ध, महावीर और कबीर की मुस्कान है—जो संसार के कोलाहल में भी मौन में स्थित रहते हैं।
2. हंसिता — जाग्रत मन की सौम्य अभिव्यक्ति
हंसिता में होंठ हिलते हैं, दाँतों की किनारी झलकती है।
यह वह मुस्कान है जहाँ भीतर की शांति बाहर झरने लगती है।
यह उस व्यक्ति की हँसी है जिसने दुखों को समझ लिया है, पर अभी उनसे पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ।
यह मुस्कान कहती है —
“मैं संसार में हूँ, पर संसार मुझमें नहीं।”
3. वीहंसिता — आनंद की पहली छलक
वीहंसिता में मुस्कान चौड़ी हो जाती है,
थोड़ी-सी हँसी जुड़ जाती है।
यह वह क्षण है जब आत्मा हल्की हो जाती है।
जीवन का बोझ कुछ देर के लिए उतर जाता है।
यह बालक-भाव की वापसी है—जहाँ हँसी बिना कारण के फूट पड़ती है।
4. उपहंसिता — अहंकार के ढहने की हँसी
यह ज़ोरदार ठहाके वाली हँसी है—
जिसमें सिर और भुजाएँ भी हिलने लगती हैं।
यह हँसी तब आती है जब व्यक्ति अपने ही नाटक को पहचान लेता है।
“मैं जिसे गंभीर समझ रहा था, वह तो एक खेल था।”
यह हँसी अहंकार को हिला देती है।
5. औहंसिता — रोते-रोते हँसने की अवस्था
यह इतनी ज़ोर की हँसी है कि आँखों से आँसू बहने लगते हैं।
पर ये आँसू दुख के नहीं होते—ये मुक्ति के आँसू होते हैं।
यह वह क्षण है जहाँ
हँसी और रोना एक हो जाते हैं,
जहाँ द्वैत टूटने लगता है।
6. अतीहंसिता — देह से परे आनंद का विस्फोट
अतीहंसिता सबसे तीव्र, सबसे शोरभरी हँसी है।
पूरा शरीर थरथराने लगता है, व्यक्ति हँसी से लोटपोट हो जाता है।
यह हँसी नहीं—समाधि का विस्फोट है।
यहाँ व्यक्ति नहीं हँसता,
हँसी ही व्यक्ति को हिला रही होती है।
देह झुक जाती है, अहंकार गिर जाता है,
और आत्मा आकाश की तरह फैल जाती है।
निष्कर्ष : हँसी — ईश्वर की सबसे सरल साधना
जो व्यक्ति हँसी को केवल मज़ाक समझता है, वह सतह पर जीता है।
और जो हँसी के इन स्तरों को पहचान लेता है,
वह जान जाता है कि—
हँसी ही ध्यान है,
हँसी ही प्रार्थना है,
हँसी ही ईश्वर से साक्षात्कार है।
जब जीवन बोझ लगे—तो हँसो।
जब समझ आ जाए—तो मुस्कराओ।
और जब सब छूट जाए—तो बस… सीता में ठहर जाओ।
कहानी : “हँसी का साधु”
एक पहाड़ी गाँव के किनारे, सालों से एक साधु रहता था।
लोग कहते थे—“वह बहुत कम बोलता है, पर जब भी पास बैठो, मन हल्का हो जाता है।”
एक दिन एक जिज्ञासु युवक उसके पास पहुँचा।
बोला,
“बाबा, लोग कहते हैं आप हँसी से ज्ञान देते हैं। हँसी में भला ज्ञान कैसे?”
साधु ने कुछ नहीं कहा।
बस युवक को देखा…
और हल्की-सी, लगभग अदृश्य मुस्कान उसके चेहरे पर उभर आई।
युवक को लगा जैसे किसी ने भीतर दीया जला दिया हो।
साधु बोला—
“यह सीता है। जो जागा हुआ है, वही इसे देख सकता है।”
पहली सीख : सीता
अगले दिन युवक फिर आया।
साधु इस बार थोड़ा मुस्कराया, होंठ हिले, दाँतों की झलक दिखी।
साधु बोला,
“जब भीतर शांति आती है, तो बाहर मुस्कान खुद आ जाती है।
इसे हंसिता कहते हैं।”
युवक ने पहली बार ध्यान दिया—
कि बिना कारण मुस्कराना भी एक अवस्था है।
दूसरी सीख : वीहंसिता
कुछ दिन बाद साधु ने किसी बच्चे की तरह
खुलकर थोड़ी हँसी हँसी।
युवक भी हँस पड़ा।
साधु बोला,
“जब जीवन का बोझ हल्का हो जाए,
तब आत्मा बालक बन जाती है।
यह है वीहंसिता।”
तीसरी सीख : उपहंसिता
एक दिन युवक ने अपनी परेशानियाँ गिनानी शुरू कीं—
धन, अपमान, असफलता, भविष्य का डर।
साधु ज़ोर से ठहाका मारकर हँस पड़ा,
उसका सिर और हाथ हिलने लगे।
युवक चौंक गया।
“आप मेरी पीड़ा पर हँस रहे हैं?”
साधु बोला,
“नहीं बेटा, मैं उस नाटक पर हँस रहा हूँ
जिसे तू जीवन समझ बैठा है।”
यह थी उपहंसिता—
जहाँ अहंकार दरकने लगता है।
चौथी सीख : औहंसिता
अगली सुबह युवक साधु को देख रो पड़ा।
पर अचानक साधु भी हँसने लगा—
इतना कि उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
साधु बोला,
“जब हँसी और रोना एक हो जाएँ,
तब द्वैत टूट जाता है।
यह है औहंसिता।”
युवक समझ गया—
आँसू भी कभी आनंद के होते हैं।
अंतिम सीख : अतीहंसिता
अंतिम दिन साधु ध्यान में बैठा था।
अचानक उसके शरीर में कंपन हुआ,
वह ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा।
पूरा शरीर ठहाकों में झुक रहा था,
जैसे कोई उसे हिला रहा हो।
कुछ देर बाद सब शांत।
साधु ने आँखें खोलीं और कहा,
“अब यहाँ कोई हँसने वाला नहीं बचा।
हँसी ही रह गई है।”
यह थी अतीहंसिता—
जहाँ ‘मैं’ पूरी तरह गिर जाता है।
कहानी का सार
युवक गाँव छोड़ गया,
पर जाते-जाते बस इतना बोला—
“मैं ज्ञान खोजने आया था,
पर हँसना सीख गया।”
और सच में,
जो हँसना सीख ले—
वह जीना सीख लेता है।
हमारा उद्देश्य केवल सजगता बढ़ाना है ,हम जन साधारण को संतो, ध्यान विधियों ,ध्यान साधना से संबन्धित पुस्तकों के बारे मे जानकारी , इंटरनेट पर मौजूद सामग्री से जुटाते है । हम किसी धर्म ,संप्रदाय ,जाति , कुल ,या व्यक्ति विशेष की मान मर्यादा को ठेस नही पहुंचाते है । फिर भी जाने अनजाने , यदि किसी को कुछ सामग्री सही प्रतीत नही होती है , कृपया हमें सूचित करें । हम उस जानकारी को हटा देंगे ।
website पर संतो ,ध्यान विधियों , पुस्तकों के बारे मे केवल जानकारी दी गई है , यदि साधकों /पाठकों को ज्यादा जानना है ,तब संबन्धित संस्था ,संस्थान या किताब के लेखक से सम्पर्क करे ।
© 2024. All rights reserved.
