इंद्रियों के पार
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1/26/20261 मिनट पढ़ें
इंद्रियों के पार
मनुष्य का शरीर जब आकार लेता है, तब उसके साथ-साथ उसकी ज्ञानेंद्रियाँ भी विकसित होती हैं। यही ज्ञानेंद्रियाँ आगे चलकर केवल संसार को जानने का माध्यम नहीं बनतीं, बल्कि काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे वृत्तियों की जड़ भी बन जाती हैं।
सभी आध्यात्मिक परंपराएँ कहती हैं कि “स्वयं को जानने और गहरे रहस्यों को समझने के लिए इन पाँचों का त्याग आवश्यक है।” परंतु यह नहीं बताया जाता कि त्याग कैसे हो।
यदि हम गर्भावस्था की अवस्था पर विचार करें, तो पाते हैं कि उसी समय मनुष्य की पाँचों ज्ञानेंद्रियाँ बन जाती हैं। जन्म के साथ ही वह इन पाँच द्वारों से संसार को ग्रहण करने लगता है। धीरे-धीरे—
त्वचा से काम का अनुभव,
कान से क्रोध की प्रतिक्रिया,
नाक से लोभ की आसक्ति,
मुख व जिह्वा से मोह का बंधन,
और नेत्रों से अहंकार का विस्तार होने लगता है।
इस प्रकार स्पष्ट होता है कि ये पाँच विकार बाहर से नहीं आते, बल्कि ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से भीतर आकार लेते हैं। यदि मनुष्य वास्तव में स्वयं को जानना चाहता है, तो उसे इन विकारों से लड़ने की नहीं, बल्कि अपनी ज्ञानेंद्रियों को गहराई से समझने की आवश्यकता है।
जिस क्षण ज्ञानेंद्रियाँ बाहर की वस्तुओं की ओर देखने के स्थान पर अंदर की ओर मुड़ने लगती हैं, उसी क्षण काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार शत्रु नहीं, बल्कि समझने योग्य प्रक्रियाएँ बन जाते हैं। और समझ ही वह द्वार है, जहाँ से मुक्ति आरंभ होती है।
गूढ़ संकेत
यह विचार योग, उपनिषद और बौद्ध दर्शन से गहराई से जुड़ा है।
यहाँ त्याग का अर्थ दबाना नहीं है, बल्कि साक्षी भाव से देखना है।
जब इंद्रियाँ “भोगी” नहीं, “द्रष्टा” बनती हैं—तब विकार अपने आप ढीले पड़ने लगते हैं।
आत्म-ज्ञान का मार्ग इंद्रियों से भागने का नहीं, इंद्रियों के पार देखने का मार्ग है।
गुरु–शिष्य संवाद
शिष्य:
गुरुदेव, शास्त्र कहते हैं कि काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार को छोड़े बिना सत्य का बोध नहीं होता।
पर मैं पूछना चाहता हूँ—इन्हें छोड़ा कैसे जाए?
मैं जितना छोड़ना चाहता हूँ, उतना ही ये पकड़ मजबूत कर लेते हैं।
गुरु:
वत्स, तू छोड़ने की बात कर रहा है,
पर क्या तूने कभी यह जाना है कि ये आए कहाँ से?
शिष्य:
ये तो मेरे भीतर ही हैं, गुरुदेव।
इन्हीं से मैं दुखी भी होता हूँ।
गुरु:
भीतर हैं—यह सही है।
पर इनके द्वार बाहर की ओर खुलते हैं।
जब तू देखता है, सुनता है, छूता है, सूँघता है और स्वाद लेता है—
तभी ये पाँच विकार जागते हैं।
शिष्य:
तो क्या इंद्रियाँ ही दोषी हैं?
गुरु (मुस्कुराते हुए):
नहीं पुत्र।
इंद्रियाँ तो केवल द्वार हैं।
दोष द्वार में नहीं,
उस दिशा में है जहाँ तू उन्हें टिकाए रखता है।
शिष्य:
मैं समझा नहीं।
गुरु:
जब तू आँखों से केवल बाहर देखता है,
तो तुलना जन्म लेती है—और वहीं अहंकार पनपता है।
जब कान केवल बाहर सुनते हैं,
तो विरोध से क्रोध उठता है।
जब जिह्वा भोग में डूबी रहती है,
तो मोह जड़ पकड़ता है।
पर सोच—
यदि वही इंद्रियाँ भीतर की ओर मुड़ जाएँ,
तो क्या होगा?
शिष्य (कुछ ठहरकर):
शायद… मैं अपने ही मन को देखने लगूँगा?
गुरु:
यही तो साधना है।
काम को दबाना नहीं,
यह देखना कि स्पर्श की चाह कहाँ से उठी।
क्रोध से लड़ना नहीं,
यह जानना कि चोट किस विचार को लगी।
जब तू देखता है—
तो विकार टिक नहीं पाते।
अंधकार ज्ञान के सामने नहीं ठहरता।
शिष्य:
तो त्याग का अर्थ लड़ाई नहीं,
जागरूकता है?
गुरु:
हाँ वत्स।
जिस दिन तेरी इंद्रियाँ
भोगी नहीं, साक्षी बन जाएँगी—
उसी दिन काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार
अपने आप विदा ले लेंगे।
शिष्य (नत-मस्तक होकर):
आज पहली बार समझ आया, गुरुदेव—
मैं संसार को देखता रहा,
पर स्वयं को देखना भूल गया।
गुरु:
अब तू देखने लगा है।
यही आरंभ है।
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