जीते भी लकड़ी, मरते भी लकड़ी

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12/16/20251 मिनट पढ़ें

जीते भी लकड़ी, मरते भी लकड़ी

जीते भी लकड़ी, मरते भी लकड़ी, देख तमाशा लकड़ी का।
क्या जीवन, क्या मरण कबीरा, खेल रचाया लकड़ी का ॥

जिसमें तेरा जनम हुआ, वो पलंग बना था लकड़ी का,
माता तुम्हारी लोरी गावे, वो पलना था लकड़ी का।
जीते भी लकड़ी, मरते भी लकड़ी, देख तमाशा लकड़ी का ॥

पढ़ने चला जब पाठशाला में, लेखन-पाटी लकड़ी का,
गुरु ने जब-जब डर दिखलाया, वो डंडा था लकड़ी का।
जीते भी लकड़ी, मरते भी लकड़ी, देख तमाशा लकड़ी का ॥

जिसमें तेरा ब्याह रचाया, वो मंडप था लकड़ी का,
जिस पर तेरी शैया सजाई, वो पलंग था लकड़ी का।
जीते भी लकड़ी, मरते भी लकड़ी, देख तमाशा लकड़ी का ॥

डोली, पालकी और जनाज़ा, सब कुछ है ये लकड़ी का,
जनम-मरण के इस मेले में, है सहारा लकड़ी का।
जीते भी लकड़ी, मरते भी लकड़ी, देख तमाशा लकड़ी का ॥

उड़ गया पंछी, रह गई काया, बिस्तर बिछाया लकड़ी का,
एक पलक में खाक बनाया, ढेर हुआ सब लकड़ी का।
जीते भी लकड़ी, मरते भी लकड़ी, देख तमाशा लकड़ी का ॥

मरते दम तक मिटा नहीं भैया, झगड़ा-झंझट लकड़ी का,
राम नाम की रट लगाओ तो, मिट जाए झगड़ा लकड़ी का।
जीते भी लकड़ी, मरते भी लकड़ी, देख तमाशा लकड़ी का ॥

क्या राजा, क्या रंक, मनुज या संत, अंत सहारा लकड़ी का,
कहत कबीरा सुन भई साधो, ले ले तंबूरा लकड़ी का।
जीते भी लकड़ी, मरते भी लकड़ी, देख तमाशा लकड़ी का ॥

लकड़ी — निर्गुण का सबसे कठोर प्रतीक

कबीर “लकड़ी” को बार-बार क्यों लाते हैं? क्योंकि लकड़ी = जड़ता + अस्थायित्व + उपयोग
और मनुष्य भी जीवन भर उपयोग में रहता है। जो उपयोग में है — वह वस्तु है। जो साक्षी है — वही सत्य है।

जीते भी लकड़ी, मरते भी लकड़ी

यह पंक्ति मनुष्य के भ्रम पर चोट करती है। जन्म से मृत्यु तक — पालना, पाठी, डंडा, पलंग, मंडप, चिता
सब लकड़ी। निर्गुण संकेत: जो जीवन लकड़ी से शुरू होता है और लकड़ी पर ही समाप्त होता है, वह जीवन नहीं — नाटक है।

जन्म — देह में प्रवेश

पालना, पलंग — ये सुरक्षा के भ्रम हैं। कबीर कहते हैं: तुम देह में आए, पर देह तुम नहीं हो। लकड़ी यहाँ धार है — पर आधार ही सत्य नहीं।

शिक्षा — डर की लकड़ी

लेखन-पाटी और गुरु का डंडा — ज्ञान नहीं, अनुशासन सिखाते हैं। निर्गुण व्यंग्य: जिसने डर से सीखा,
वह कभी सत्य नहीं जान सकता।

विवाह — संबंधों का मंच

मंडप और शैया — रिश्तों की सजावट। कबीर पूछते हैं: आज साथ सोया, क्या वही अंत तक साथ जाएगा? लकड़ी यहाँ संरचना है, प्रेम नहीं।

डोली, पालकी, जनाज़ा

जीवन के हर मोड़ पर लकड़ी का कंधा है। निर्गुण रहस्य: जिसे सहारा चाहिए, वह पहले ही गिर चुका है।

मृत्यु — सत्य का प्रवेश द्वार

उड़ गया पंछी (आत्मा), रह गई काया (लकड़ी-समान)। यह सबसे कठोर शिक्षा है: जो जल सकता है,
वह तुम नहीं हो।

झगड़ा लकड़ी का

मरते दम तक झगड़ा — घर, संपत्ति, देह। कबीर की फटकार: मिट्टी और लकड़ी पर इतना अहंकार क्यों?

राम नाम — निर्गुण सेतु

“राम” यहाँ कोई मूर्ति नहीं — वह निर्गुण चेतना है। नाम स्मरण = साक्षी भाव जहाँ नाम है, वहाँ लकड़ी नहीं जलती।

तंबूरा लकड़ी का — अंतिम व्यंग्य

तंबूरा भी लकड़ी का है, पर उसमें नाद है। निर्गुण संकेत: वस्तु लकड़ी की है, पर स्वर निर्गुण का है।

अंतिम निष्कर्ष (कबीर का रहस्य-वाक्य)

जीवन लकड़ी का है, पर देखने वाला लकड़ी का नहीं। जो देखने वाले को जान ले, वही मुक्त है।

लकड़ी का नगर और हंस की पुकार

बहुत पहले एक नगर था —नाम था काष्ठपुर। उस नगर में जो कुछ था, लकड़ी का था। घर, मंदिर, विद्यालय, बाजार — सब। नगर के लोग कहते थे: “जो लकड़ी पर टिका है, वही सुरक्षित है।”

जन्म — पहला भ्रम

एक दिन वहाँ एक बालक जन्मा। लकड़ी के पलने में झुलाया गया। माँ ने लकड़ी की लोरी गाई। नगर के बुज़ुर्ग बोले: “देखो, जीवन को कितना अच्छा सहारा मिला है।” पर उसी रात, एक बूढ़ा फकीर आँगन के बाहर बैठा बुदबुदाया: “सहारा लकड़ी का है, पर जो आया है — वह सहारे से परे है।” कोई न समझा।

ज्ञान — डर की छाया

बालक बड़ा हुआ। लकड़ी की पाटी पर अक्षर सीखे। गलती पर लकड़ी का डंडा पड़ा। गुरु ने कहा:
“डर से ही मनुष्य सुधरता है।” फकीर हँसा: “डर से लकड़ी सीधी हो सकती है, आत्मा नहीं।”

बंधन — सजे हुए तख़्त

युवक का ब्याह हुआ। लकड़ी का मंडप, लकड़ी की शैया। लोग बोले: “अब जीवन पूर्ण हुआ।” फकीर ने पूछा: “जिसे पूर्ण कहते हो, क्या वह जलने से बचेगा?” लोग चुप रहे।

जीवन — लकड़ी का कंधा

युवक नगर में चलता, लकड़ी की छड़ी से सहारा लेता। डोली, पालकी — सब लकड़ी की। वह सोचता:
“मेरा जीवन मजबूत है।” पर फकीर रोज़ कहता: “मजबूत वह नहीं जो टिका है, मजबूत वह है जो साक्षी है।”

मृत्यु — पर्दा उठना

एक दिन युवक गिर पड़ा। लकड़ी की चारपाई, लकड़ी की अर्थी। नगर रोया। फकीर ने आकाश की ओर देखा। “उड़ गया पंछी, रह गई लकड़ी।” जब चिता जली, तो सबने देखा —लकड़ी लकड़ी में मिल गई।

रहस्य का उद्घाटन

अगली सुबह, फकीर नगर के बीच बैठा लकड़ी का तंबूरा बजाने लगा। लोग बोले: “यह भी तो लकड़ी का है!” फकीर मुस्कराया: “हाँ, पर सुनो —स्वर लकड़ी का नहीं है।”

निर्गुण बोध

फकीर बोला: “जीवन लकड़ी का मंच है, पर नाटक करने वाला निर्गुण है। जो मंच से चिपक गया — जल गया, जो दर्शक बन गया — मुक्त हुआ।” और उसी क्षण, काष्ठपुर के लोग पहली बार मौन हो गए।