मन ना रंगाए जोगी, कपड़ा रंगाए

BLOG

12/18/20251 मिनट पढ़ें

मन ना रंगाए जोगी, कपड़ा रंगाए

दोहा (भूमिका)
तन को जोगी सब करे, मन को करे न कोय।
सहजे सब सिद्धि पाइए, जो मन जोगी होय॥
हम तो जोगी मन ही के, तन के हैं ते और।
मन को जोग लगावते, दशा भई कछु और॥

मन ना रंगाए जोगी, कपड़ा रंगाए,
मन ना फिराए जोगी, मनका फिराए,
मन ना रंगाए जोगी, कपड़ा रंगाए॥

आसन मार गुफा में बैठे, मनवा चहुँ दिस ध्याए,
भव-तारण घट बीच बिराजे, खोजें तीरथ जाए,
मन ना रंगाए जोगी, कपड़ा रंगाए॥

पोथी बाँचे, याद करावे, भगति कहूँ न पाए,
मनका मनका फेरे नाहीं, तुलसी माल फिराए,
मन ना रंगाए जोगी, कपड़ा रंगाए॥

जोगी होके जागा नाहीं, चौरासी भरमाए,
जोग-जुगत सो दास कबीरा, अलख निरंजन पाए,
मन ना रंगाए जोगी, कपड़ा रंगाए॥

मन ना रंगाए जोगी, कपड़ा रंगाए,
मन ना फिराए जोगी, मनका फिराए,
मन ना रंगाए जोगी, कपड़ा रंगाए॥

मुख्य सूत्र — रंग मन का, नहीं वस्त्र का

मन ना रंगाए जोगी, कपड़ा रंगाए

कबीर सीधे वार करते हैं। वस्त्र बदलना आसान है, मन बदलना सबसे कठिन।

निर्गुण संकेत:

जो दिखता है, वह साधना नहीं।
जो भीतर घटता है, वही योग है।

तन का योग — मन का भ्रम

तन को जोगी सब करे, मन को करे न कोई

आसन, व्रत, वेश, नियम — सब देह की क्रियाएँ हैं।

कबीर कहते हैं:

देह को साधने से आत्मा नहीं खुलती।

मन जब तक रंगा नहीं, योग अभिनय है।

मन की चंचलता

आसन मार गुफा में बैठे, मनवा चहुँ दिस ध्याए

गुफा बाहरी है, मन भीतर भटकता है।

निर्गुण रहस्य: मन ही संसार है, मन ही मोक्ष।

जब मन स्थिर हुआ, गुफा स्वयं प्रकट होती है।

तीर्थ — बाहर नहीं, भीतर

भव-तारण घट बीच बिराजे, खोजें तीरथ जाए

जो तारणहार है, वह हृदय में बैठा है।

कबीर की चोट: जो भीतर का तीर्थ न देखे, वह बाहर क्यों भटके?

जप और पोथी — यांत्रिकता का खतरा

पोथी बाँचे… तुलसी माल फिराए

शब्दों का ढेर, मालाओं की गिनती — पर मन नहीं बदला।

निर्गुण चेतावनी: जब जप उँगलियों में अटक जाए, तब वह नाम नहीं रहता।

चौरासी का चक्कर

जोगी होके जागा नाहीं, चौरासी भरमाए

वेश बदल गया, पर चेतना नहीं।

निर्गुण सत्य: जागरण के बिना मोक्ष नहीं।

अलख निरंजन — निर्गुण का साक्षात्कार

जोग-जुगत सो दास कबीरा, अलख निरंजन पाए

“अलख” — जिसे देखा नहीं जा सकता।
“निरंजन” — जो माया से अछूता है।

कबीर कहते हैं:

जब मन रंग गया, तब कुछ करना नहीं पड़ा।

निर्गुण निष्कर्ष

योग वस्त्र नहीं, जागृति है।

जप माला नहीं, मौन है।

तीर्थ यात्रा नहीं, अंतर्मुखता है।

जो मन को रंग ले — वही सच्चा जोगी है।

कपड़े का रंग और मन का रंग

(गुरु–शिष्य निर्गुण संवाद कथा)

शिष्य ने केसरिया वस्त्र धारण कर लिए थे।
गले में माला, माथे पर तिलक, आँखों में वैराग्य का अभिमान।

वह गुरु के चरणों में बैठा और बोला—

शिष्य: गुरुदेव, मैंने सब त्याग दिया। घर, धन, संबंध — सब। अब बताइए, मोक्ष कब मिलेगा?

गुरु (मुस्कराकर): तूने सब छोड़ा…पर किसने छोड़ा? शिष्य चुप हो गया।

गुफा का रहस्य

शिष्य: मैं गुफा में बैठकर साधना करता हूँ, घंटों ध्यान करता हूँ।

गुरु: और ध्यान के समय तेरा मन कहाँ रहता है?

शिष्य: कभी गाँव में, कभी पुराने अपमान में, कभी भविष्य की चिंता में…

गुरु: तो फिर गुफा कहाँ हुई? गुफा तो तब है जब मन बाहर न जाए।

माला और मन

शिष्य ने माला घुमाई—

शिष्य: मैं रोज़ दस हज़ार नाम जपता हूँ।

गुरु: नाम उँगलियों में घूमता है या मन में उतरता है? शिष्य मौन हो गया।

तीर्थ की उलझन

शिष्य: मैं कई तीर्थों में स्नान कर चुका हूँ।

गुरु: क्या कभी भीतर उतरकर स्नान किया? शिष्य की आँखें झुक गईं।

निर्गुण का संकेत

शिष्य: तो फिर सच्चा योग क्या है, गुरुदेव?

गुरु: जब मन रंग जाए, तब कपड़ा चाहे जैसा हो।

शिष्य: और वह रंग कौन-सा है?

गुरु: जो दिखाई नहीं देता। जिसे कबीर ने कहा—अलख निरंजन।

जागरण का क्षण

गुरु ने एक सफ़ेद कपड़ा लिया और एक बूँद रंग की टपकाई। रंग फैल गया।

गुरु: ऐसे ही एक बूँद बोध अगर मन में उतर जाए, तो पूरा जीवन रंग जाता है। शिष्य की आँखों से आँसू बह निकले।

अंतिम गुरु-वाक्य

गुरु: कपड़ा रंगना सरल है, मन रंगना साहस है। जो मन रंगा —वही जोगी।

शिष्य ने माला उतार दी। वस्त्र वही रहे, पर मन पहली बार स्थिर था