मर्म कैसे पाऊँ रे,
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12/28/20251 मिनट पढ़ें
मर्म कैसे पाऊँ रे, पंडित कौन समझाई।
मेरी आवागमन बिलाई रे॥
बहु विधि धर्म निरूपण करते, देखे सब कोई।
जेहि धर्म भ्रम घूट सो, धर्माधिकारी कोई॥
मर्म कैसे पाऊँ रे…
कर्म अकर्म विचार सुनूँ, सुन-सुन वेद पुराण।
शंका सदा हृदय बसे, कौन हरै अभिमान॥
मर्म कैसे पाऊँ रे…
बाहर मुँड के तू खोजिए रे, घट भीतर विविध विकार।
सूची कौन विधि होइये, कूँजर विविध व्यवहार॥
मर्म कैसे पाऊँ रे…
सतयुग सतजप जाप करै, द्वापर पूजा आचार।
तीनों जुग तीनों दृष्टि काल, केवल नाम आधार॥
मर्म कैसे पाऊँ रे…
रवि प्रकाश रजनी जात है, यो गति विषय संसार।
पारस मिले ताँबा घापा, कनक होत न बार॥
मर्म कैसे पाऊँ रे…
धन जौबन हरि ना मिलै, दुल धरै न अपार।
एकै-एकै ज्ञानी जाणै, सब संसार॥
मर्म कैसे पाऊँ रे…
नेक जतन करि रहिए, तारै न तरे भ्रम पास।
प्रेम-भक्ति नाहीं उपजै, ताते जन रैदास॥
मर्म कैसे पाऊँ रे…
🌿 निर्गुण दर्शन : गूढ़ व्याख्या
(पद: “मर्म कैसे पाऊँ रे…”)
“मर्म कैसे पाऊँ रे, पंडित कौन समझाई।
मेरी आवागमन बिलाई रे॥”
मर्म = धर्म का भीतरी रहस्य
आवागमन = जन्म–मरण का चक्र
👉 कवि पूछ रहा है—शास्त्र पढ़ाने वाला तो बहुत है,
पर जीवन–बंधन काटने वाला पंडित कौन है?
🔹 निर्गुण में ज्ञान वही है जो मुक्ति दे, जो केवल समझाए नहीं—बिलाई (मिटा) दे।
“बहु विधि धर्म निरूपण करते, देखे सब कोई।
जेहि धर्म भ्रम घूट सो, धर्माधिकारी कोई॥”
यहाँ धर्म के बाज़ार पर प्रहार है।
हर कोई धर्म का अर्थ बता रहा है
पर वही धर्म सत्य है
जो भ्रम को गला घोंट दे
🔹 निर्गुण कहता है: जो भ्रम बढ़ाए, वह अधर्म है—भले ही धर्म कहलाए।
“कर्म अकर्म विचार सुनूँ, सुन-सुन वेद पुराण।
शंका सदा हृदय बसे, कौन हरै अभिमान॥”
कर्म–अकर्म की चर्चा से ज्ञान नहीं, संदेह बढ़ता है।
👉 प्रश्न है—शास्त्र तो सुने, पर अहंकार कौन तोड़े?
🔹 निर्गुण में अभिमान ही अंतिम पाप है।
“बाहर मुँड के तू खोजिए रे, घट भीतर विविध विकार।
सूची कौन विधि होइये, कूँजर विविध व्यवहार॥”
यह बाहरी संन्यास की तीखी आलोचना है।
सिर मुँडाया
वेश बदला
पर भीतर वासनाएँ जीवित
कूँजर (हाथी) नहा कर फिर मिट्टी लपेट लेता है।
🔹 निर्गुण कहता है—देह नहीं, चित्त धोओ।
“सतयुग सतजप जाप करै, द्वापर पूजा आचार।
तीनों जुग तीनों दृष्टि काल, केवल नाम आधार॥”
युग बदलते हैं, मार्ग बदलते हैं।
पर एक तत्व शाश्वत है— नाम (स्मरण / चेतना)
🔹 नाम यहाँ शब्द नहीं, सतत जागरूकता है।
“रवि प्रकाश रजनी जात है, यो गति विषय संसार।
पारस मिले ताँबा घापा, कनक होत न बार॥”
संसार दिन–रात की तरह क्षणभंगुर है।
👉 पारस मिल जाए, तो ताँबा तुरंत सोना बनता है।
🔹 संकेत है—सत्संग या सत्य-स्पर्श दुर्लभ है, पर प्रभाव तात्कालिक।
“धन जौबन हरि ना मिलै, दुल धरै न अपार।
एकै-एकै ज्ञानी जाणै, सब संसार॥”
न धन से, न यौवन से न दिखावे से हरि मिलता है।
👉 एक सच्चा ज्ञानी पूरे संसार से भारी है।
🔹 निर्गुण में गुण नहीं, बोध मूल्यवान है।
“नेक जतन करि रहिए, तारै न तरे भ्रम पास।
प्रेम-भक्ति नाहीं उपजै, ताते जन रैदास॥”
अंतिम और सबसे गूढ़ सत्य—
प्रयास जरूरी है
पर प्रयास ही पर्याप्त नहीं
👉 जब तक प्रेम-भक्ति नहीं उपजती, भ्रम का बंधन नहीं टूटता।
🔹 प्रेम-भक्ति अनुग्रह से जन्म लेती है, कर्म से नहीं।
🌸 पद का अंतिम मर्म
धर्म साधन नहीं, धर्म स्थिति (State of Being) है।
पंडित वह नहीं जो बताए, पंडित वह है जो तुम्हें तुमसे मुक्त कर दे।
🌒 कहानी : “मर्म की तलाश”
एक शहर था—जहाँ हर गली में धर्म की दुकान थी।
कहीं कर्म बिकता था, कहीं अकर्म, कहीं मुक्ति की रसीद।
उसी शहर में एक युवक रहता था। वह रोज़ एक ही प्रश्न लेकर निकलता—“मर्म कैसे पाऊँ?”
🪔 पंडितों का नगर
वह पहले पंडितों के पास गया। किसी ने वेद खोले, किसी ने पुराण।
एक बोला—“यह करो, वह छोड़ो।”
दूसरा बोला—“यह पाप है, वह पुण्य।”
युवक ने सब सुना। पर लौटते समय उसका मन और भारी हो गया। उसकी आवागमन की पीड़ा
वैसी ही बनी रही।
🔥 कर्म और संशय
फिर वह साधुओं के पास गया। उन्होंने कर्म–अकर्म समझाए। पर जितना सुना, उतना ही संशय गहरा गया।
रात को वह बोला—“अगर सत्य इतना सीधा है, तो इतना उलझा क्यों?”
✂️ बाहर का संन्यास
एक दिन उसने सिर मुँडाया। वेश बदला। लोगों ने उसे संत कहना शुरू किया।
पर भीतर…क्रोध, लालसा, तुलना—सब वैसे ही थे।
वह हँस पड़ा—“मैं तो हाथी बन गया—नहाकर फिर मिट्टी में लोटने वाला।”
🌊 तीनों युग
एक वृद्ध मिला। बोला—“सतयुग में जप था, द्वापर में पूजा।”
युवक ने पूछा—“और आज?”
वृद्ध बोला—“आज भी वही—नाम।”
युवक समझा—नाम कोई शब्द नहीं, एक जाग्रत स्मरण है।
✨ पारस का क्षण
एक शाम, नदी किनारे, वह चुप बैठा था।
न कोई जप, न कोई याचना।
बस साँस आती-जाती।
अचानक कुछ टूटा—कोई पकड़, कोई दावा।
उस पल उसने जाना—पारस मिला है।
ताँबा सोना हो गया।
🌼 मर्म का प्रकट होना
अब उसे कुछ पाने की चाह नहीं थी।
न धन, न यौवन, न यश।
वह हर चेहरे में एक ही झलक देखने लगा।
उसने कहा—“एक ही ज्ञानी काफ़ी है पूरे संसार के लिए।”
🕊️ अंत नहीं, अंतरण
उसने फिर पूछा—“क्या मैं पार उतर गया?”
उत्तर नहीं आया। पर आवागमन का डर न जाने कब मिट गया।
और वहीं—मर्म प्रकट हुआ।
🌸 कहानी का मर्म
सत्य समझ से नहीं, छूटने से मिलता है
बाहरी साधन सहायक हैं, साध्य नहीं
प्रेम-भक्ति उगती नहीं, उतरती है
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