ओ रे पिया
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2/23/20261 मिनट पढ़ें
ओ रे पिया हाय… ओ रे पिया
ओ रे पिया हाय… ओ रे पिया
ओ रे पिया हाय… ओ रे पिया
उड़ने लगा क्यों मन बावरा रे
आया कहाँ से यह हौसला रे
ओ रे पिया… ओ रे पिया हाय
ताना-बाना… ताना-बाना
बुनती हवा हाय…! बुनती हवा
बूँदें भी तो आए नहीं
बाज़ यहाँ हाय…!
साज़िश में शामिल सारा जहाँ है
हर ज़र्रे ज़र्रे की
यह इल्तिज़ा है
ओ रे पिया…!
नज़रें बोलें दुनिया बोले
दिल की ज़ुबाँ हाय, दिल की ज़ुबाँ
इश्क़ माँगे इश्क़ चाहे
कोई तूफ़ान…!
चलना आहिस्ते
इश्क़ नया है
पहला यह वादा
हमने किया है
ओ रे पिया हाय
ओ रे पिया हाय
ओ रे पिया
पिया… ए पिया…
नंगे पैरों पे अंगारों
चलती रही हाय
चलती रही
लगता है के गैरों में
पलती रही हाय
ले चल वहाँ जो
मुल्क तेरा है
जाहिल ज़माना
दुश्मन मेरा है
ओ रे पिया हाय
ओ रे पिया…!
यह गीत केवल प्रेमी-प्रेमिका का संवाद नहीं है। सूफ़ी और आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो “पिया” परमात्मा है और गाने वाली आत्मा (रूह) है। यह पूरी रचना आत्मा की अपने मूल स्रोत की ओर उड़ान की कथा है।
१. “उड़ने लगा क्यों मन बावरा रे…”
जब साधक के भीतर पहली बार ईश्वर-स्मरण जागता है, तो मन असामान्य लगने लगता है।
वह सांसारिक सीमाओं से ऊपर उठना चाहता है।
“आया कहाँ से यह हौसला?”
यह हौसला व्यक्ति का नहीं —
यह भीतर से उठती दिव्य पुकार है।
जैसे बीज के भीतर वृक्ष बनने की चाह स्वयं आती है।
२. “ताना-बाना बुनती हवा…”
यह सृष्टि का रहस्य है।
हवा (अदृश्य शक्ति) जीवन का ताना-बाना बुन रही है।
हम सोचते हैं हम कुछ कर रहे हैं,
पर असल में कोई अदृश्य सत्ता सब बुन रही है।
“बूँदें भी तो आए नहीं…”
कभी-कभी साधक को लगता है कि कृपा की वर्षा क्यों नहीं हो रही,
पर हवा लगातार बुन रही है —
अंदर परिवर्तन चल रहा है।
३. “साज़िश में शामिल सारा जहाँ है…”
जब आत्मा प्रेम-पथ पर चलती है,
तो पूरा संसार उसे रोकता हुआ प्रतीत होता है।
यह बाहरी विरोध नहीं,
बल्कि भीतर के संस्कार, भय, मोह, अहंकार —
सब मिलकर एक “साज़िश” बनाते हैं।
हर कण पुकार रहा है —
“जागो, अपने सत्य को पहचानो।”
४. “नज़रें बोलें, दुनिया बोले…”
यहाँ दिल की भाषा बाहरी भाषा से अलग है।
दुनिया तर्क से बोलती है,
दिल इश्क़ से बोलता है।
“इश्क़ माँगे इश्क़ चाहे कोई तूफ़ान”
सच्चा प्रेम सुविधा नहीं चाहता,
वह परीक्षा से गुजरना चाहता है।
तूफ़ान प्रेम की गहराई को प्रकट करता है।
५. “चलना आहिस्ते, इश्क़ नया है…”
आध्यात्मिक पथ पर जल्दबाज़ी नहीं चलती।
प्रेम को पकने में समय लगता है।
पहला वादा — समर्पण का है।
यह चेतावनी है —
इश्क़ खिलौना नहीं,
यह आत्म-विघटन है।
६. “नंगे पैरों पे अंगारों चलती रही…”
यह तपस्या का प्रतीक है।
आत्मा संसार में रहते हुए जलती है,
आलोचना, अस्वीकार, अकेलापन —
ये सब अंगारे हैं।
फिर भी वह चलती रहती है।
क्योंकि उसे अपने “मुल्क” (मूल घर) की याद है।
७. “ले चल वहाँ जो मुल्क तेरा है…”
यह पंक्ति अत्यंत गूढ़ है।
यह मुक्ति की पुकार है।
आत्मा कहती है —
“मुझे वहाँ ले चल जहाँ मैं मूलतः हूँ।”
यह “मुल्क” कोई भौतिक स्थान नहीं,
बल्कि चेतना की अवस्था है —
जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है।
समग्र आध्यात्मिक रहस्य
यह गीत आत्मा की यात्रा है:
1. जागृति (मन का उड़ना)
2. अदृश्य शक्ति का बोध
3. संसार से संघर्ष
4. इश्क़ की परीक्षा
5. तपस्या
6. अंततः अपने मूल घर की चाह
“ओ रे पिया” पुकार नहीं,
ध्यान-मंत्र है।
जब इसे भीतर से दोहराया जाता है,
तो यह नाम-स्मरण बन जाता है।
यह गीत कहता है —
प्रेम में जलना ही प्रकाश बनना है।
संसार में भटकना ही घर की याद जगाता है।
🌙 आत्मा और परमात्मा का विस्तृत सूफ़ियाना संवाद
(“ओ रे पिया” के गूढ़ रहस्य पर आधारित)
रात की निस्तब्धता में, जब सारे स्वर थम जाते हैं,
एक सूक्ष्म पुकार उठती है —
वह आत्मा है, जो अपने परम स्रोत से बात कर रही है।
१. पहली पुकार
आत्मा:
ओ रे पिया…
मेरा मन क्यों उड़ने लगा है?
यह हौसला कहाँ से आया?
मैं तो मिट्टी थी… अब आकाश क्यों चाहती हूँ?
परमात्मा:
तू मिट्टी नहीं, मिट्टी में छिपी चिंगारी है।
जब हवा छूती है, चिंगारी लपट बनना चाहती है।
यह हौसला तेरा नहीं —
मेरी याद है, जो तुझे भीतर से खींच रही है।
२. ताना-बाना
आत्मा:
यह जीवन उलझा हुआ ताना-बाना क्यों है?
कभी कृपा की बूँद नहीं गिरती,
फिर भी कुछ अदृश्य बुनता रहता है।
परमात्मा:
मैं हवा की तरह हूँ — दिखता नहीं,
पर हर धागे को जोड़ता हूँ।
तू वर्षा खोजती है,
मैं तुझे समुद्र बना रहा हूँ।
धैर्य रख…
जो बुन रहा है, वही तेरा भाग्य नहीं —
तेरा बोध है।
३. साज़िश
आत्मा:
लगता है सारा जहाँ मेरे खिलाफ़ है।
हर कदम पर बाधा, हर ओर भ्रम।
परमात्मा:
संसार तेरे विरुद्ध नहीं,
तेरे जागरण के पक्ष में है।
जो तुझे रोकता है, वही तुझे मजबूत करता है।
हर ठोकर एक दरवाज़ा है —
जो भीतर खुलता है।
४. इश्क़ और तूफ़ान
आत्मा:
मेरा दिल इश्क़ माँगता है।
पर क्यों तूफ़ान के बिना यह इश्क़ नहीं मिलता?
परमात्मा:
क्योंकि तूफ़ान में ही पता चलता है
कि नाव तिनके की है या पतवार की।
इश्क़ आराम नहीं है,
इश्क़ विसर्जन है।
जो डूबता है, वही पार होता है।
५. अंगारों की राह
आत्मा:
मैं नंगे पाँव अंगारों पर चलती रही।
दर्द ने मुझे घेरा।
क्या यह तेरी राह है?
परमात्मा:
अंगारे तेरे शत्रु नहीं,
तेरे शुद्धिकरण की अग्नि हैं।
सोना जब तक जलता नहीं,
आभूषण नहीं बनता।
तू दर्द नहीं है —
तू उस दर्द में चमकती चेतना है।
६. “मुल्क तेरा है…”
आत्मा:
ले चल वहाँ, जो मुल्क तेरा है।
यह दुनिया परायी लगती है।
परमात्मा (मुस्कुराकर):
जिस मुल्क को तू खोज रही है,
वह स्थान नहीं — अवस्था है।
जब तेरी पहचान मिटेगी,
वही मेरा मुल्क प्रकट होगा।
तू बाहर लौटना चाहती है,
मैं तुझे भीतर बुला रहा हूँ।
७. अंतिम रहस्य
आत्मा:
तो क्या मैं कभी तुझमें मिल जाऊँगी?
परमात्मा:
तू अलग कब थी?
तेरी दूरी ही तेरा भ्रम है।
“ओ रे पिया” कहने वाली भी तू,
और सुनने वाला भी तू।
जब पुकार मौन हो जाएगी,
तभी मिलन पूर्ण होगा।
🌿 अंतिम बोध
आत्मा धीरे-धीरे शांत हो जाती है।
अब उड़ान बेचैनी नहीं,
स्वाभाविक विस्तार है।
अब अंगारे जलन नहीं,
दीपक हैं।
अब “ओ रे पिया” पुकार नहीं,
श्वास बन गया है।
गूढ़ सार
· मन का उड़ना = जागृति
· ताना-बाना = कर्म और चेतना का जाल
· तूफ़ान = परीक्षा
· अंगारे = तपस्या
· मुल्क = आत्म-बोध
· पिया = परमात्मा (जो स्वयं भीतर है)
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