परतों के पार : एक मनुष्य की यात्रा
BLOG
2/7/20261 मिनट पढ़ें
मानव-मन एक परतदार संरचना है, जो बाहरी जीवन की आवश्यकताओं से लेकर आंतरिक आत्मिक अनुभवों तक फैली हुई है। मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन इन्हीं मानसिक परतों के बीच संघर्ष, विकास और रूपांतरण की कहानी है। प्रारंभ में मन भय, अहंकार और हिंसा जैसी मूल प्रवृत्तियों से संचालित होता है, जो उसे जीवित रहने में सहायता तो देती हैं, पर वहीं बाँध भी लेती हैं। जैसे-जैसे चेतना का विस्तार होता है, मनुष्य इन निचली प्रवृत्तियों से ऊपर उठकर समझ, भक्ति, ध्यान और अंततः समाधि की अवस्था की ओर अग्रसर होता है। मानव-मन की इन परतों को समझना वास्तव में स्वयं को समझने की दिशा में पहला कदम है।
1. भय की परत – जीवित रहने की प्रवृत्ति
यह परत मनुष्य के अस्तित्व से जुड़ी है।
यह वही मन है जो कहता है—
कहीं खाना न मिले तो?
बीमारी हो गई तो क्या होगा?
बुढ़ापे में सहारा न रहा तो?
यह परत पशु-जगत से मनुष्य को विरासत में मिली है। समस्या तब होती है जब मनुष्य जीवन भर इसी डर में जीता है। तब वह भविष्य की चिंता में वर्तमान खो देता है।
👉 भय की परत आवश्यक है, लेकिन शासक नहीं होनी चाहिए।
2. अहंकार की परत – “मैं कौन हूँ” की गलत पहचान
भय से निकलने के लिए मनुष्य शक्ति खोजता है, और वहीं से अहंकार जन्म लेता है।
मैं अमीर हूँ
मैं ज्ञानी हूँ
मैं सही हूँ, बाकी गलत
यह परत समाज चलाने में मदद करती है, लेकिन यही परत मनुष्य को अलगाव में भी डाल देती है।
अहंकार टूटता है तो दुख होता है, और उसी दुख से आगे बढ़ने की संभावना बनती है।
👉 अहंकार सीढ़ी है, मंज़िल नहीं।
3. हिंसा की परत – दबे भय और अहंकार का विस्फोट
जब भय और अहंकार को समझ नहीं मिलती, तो वे हिंसा के रूप में बाहर आते हैं।
हिंसा केवल शारीरिक नहीं होती—
कटु शब्द
तिरस्कार
बदला
दूसरों को नीचा दिखाने में सुख
यह परत व्यक्ति को क्षणिक संतोष देती है, लेकिन अंत में खालीपन और पश्चाताप छोड़ जाती है।
👉 हिंसा भीतर की कमजोरी की आवाज़ है।
4. समझ की परत – विवेक का जन्म
यहीं से मनुष्य सच में मनुष्य बनता है। यह प्रश्न उठते हैं—
मैं ऐसा क्यों हूँ?
क्रोध से मुझे क्या मिला?
क्या कोई और रास्ता है?
यह बुद्धि, करुणा और संतुलन की परत है। यहीं से शिक्षा, नैतिकता और आत्मचिंतन जन्म लेते हैं।
👉 समझ आने पर जीवन प्रतिक्रिया नहीं, चयन बन जाता है।
5. भक्ति की परत – अहंकार का पिघलना
समझ से आगे जाने पर मनुष्य को लगता है कि सब कुछ उसके वश में नहीं है।
यहाँ भक्ति पैदा होती है—
गुरु के प्रति
ईश्वर के प्रति
प्रकृति के प्रति
जीवन के प्रति
यह किसी धर्म में बंधी नहीं होती। यहाँ “मैं करता हूँ” से “मेरे माध्यम से हो रहा है” की भावना आती है।
👉 भक्ति डर से नहीं, प्रेम से जन्म लेती है।
6. ध्यान की परत – भीतर की यात्रा
भक्ति के बाद मन शांत होने लगता है। अब मन बाहर नहीं भटकता, वह भीतर की ओर मुड़ता है।
ध्यान में—
विचार आते हैं, पर पकड़ नहीं बनती
इच्छाएँ उठती हैं, पर बाँधती नहीं
‘मैं’ धीरे-धीरे विलीन होने लगता है
यहाँ व्यक्ति स्वयं को शरीर-मन से अलग साक्षी के रूप में देखने लगता है।
👉 ध्यान अभ्यास है, कोई उपलब्धि नहीं।
7. समाधि की परत – पूर्ण मुक्ति
यह शब्दों से परे की अवस्था है।
यहाँ न साधक रहता है, न साधना।
न भय
न अहंकार
न इच्छा
न द्वंद्व
केवल शुद्ध चेतना, आनंद और मौन। यह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति की अवस्था है।
👉 समाधि कुछ पाने की नहीं,
सब कुछ छूट जाने की अवस्था है।
समग्र दृष्टि
ये सात परतें एक साथ मौजूद रहती हैं, पर जिस परत को हम ऊर्जा देते हैं, वही हावी होती है।
जीवन का उद्देश्य है—डर से जागरूकता की ओर, अहंकार से करुणा की ओर, और अंततः स्वयं से सत्य की ओर।
परतों के पार : एक मनुष्य की यात्रा
एक गाँव में आरव नाम का युवक रहता था। साधारण जीवन था, पर उसका मन कभी साधारण नहीं रहा।
सुबह आँख खुलते ही मन में एक ही आवाज़ गूँजती—
“अगर कल काम न मिला तो?”
“अगर बीमार पड़ गया तो?”
भय की परत
आरव दिन-रात मेहनत करता, बचत करता, पर शांति फिर भी नहीं मिलती।
भय उसकी छाया बन चुका था—हर समय साथ।
वह जी तो रहा था, पर जैसे साँस उधार की हो।
अहंकार की परत
समय के साथ उसे सफलता मिली। लोग सम्मान देने लगे।
अब मन कहता—
“मैं दूसरों से बेहतर हूँ।”
“मेरी मेहनत ने मुझे यहाँ पहुँचाया है।”
यह सोच उसे शक्ति देती थी, पर साथ ही उसे अकेला भी कर रही थी।
जब किसी ने उसकी आलोचना की, तो भीतर कुछ टूट गया।
उसी टूटन से पहला प्रश्न जन्मा।
हिंसा की परत
टूटे अहंकार ने क्रोध का रूप लिया।
आरव की ज़ुबान कटु हो गई, व्यवहार कठोर।
वह जीत तो जाता, पर रात को मन खाली रह जाता।
नींद में भी बहस चलती रहती।
एक दिन उसने महसूस किया—
“मैं दूसरों से नहीं, खुद से लड़ रहा हूँ।”
समझ की परत
यहीं से यात्रा ने मोड़ लिया।
उसने प्रश्न करना शुरू किया, दोष नहीं देना।
क्रोध आने पर वह रुक जाता, देखता—यह आया कहाँ से?
पहली बार जीवन प्रतिक्रिया नहीं, चयन बना।
भक्ति की परत
एक वृद्ध संत से भेंट हुई।
संत ने कुछ नहीं सिखाया, बस इतना कहा—
“सब कुछ तुम्हारे नियंत्रण में नहीं है।”
उस दिन आरव ने पहली बार सिर झुकाया—डर से नहीं, कृतज्ञता से।
पेड़, आकाश, जीवन—सबके प्रति एक कोमल भाव जागा।
ध्यान की परत
अब वह रोज़ चुपचाप बैठने लगा।
विचार आते, जाते—वह बस देखता।
धीरे-धीरे ‘मैं’ हल्का होने लगा, जैसे बोझ उतर रहा हो।
वह अपने मन को देखने लगा, मन बनकर जीने के बजाय।
समाधि की झलक
एक सुबह ध्यान में कुछ घटा—
कोई अनुभव नहीं, कोई दावा नहीं।
बस गहरा मौन… और अकारण आनंद।
जब आँख खुली, वही संसार था—
पर देखने वाला बदल चुका था।
समग्र सत्य
आरव कहीं पहुँचा नहीं था,
बस जो झूठ था, वह छूट गया था।
भय अब भी आता था,
अहंकार कभी-कभी सिर उठाता था,
पर अब वे मालिक नहीं थे—मेहमान थे।
और आरव समझ गया—
जीवन परतों को मिटाने का नहीं,
उनके पार जागते जाने का नाम है।
हमारा उद्देश्य केवल सजगता बढ़ाना है ,हम जन साधारण को संतो, ध्यान विधियों ,ध्यान साधना से संबन्धित पुस्तकों के बारे मे जानकारी , इंटरनेट पर मौजूद सामग्री से जुटाते है । हम किसी धर्म ,संप्रदाय ,जाति , कुल ,या व्यक्ति विशेष की मान मर्यादा को ठेस नही पहुंचाते है । फिर भी जाने अनजाने , यदि किसी को कुछ सामग्री सही प्रतीत नही होती है , कृपया हमें सूचित करें । हम उस जानकारी को हटा देंगे ।
website पर संतो ,ध्यान विधियों , पुस्तकों के बारे मे केवल जानकारी दी गई है , यदि साधकों /पाठकों को ज्यादा जानना है ,तब संबन्धित संस्था ,संस्थान या किताब के लेखक से सम्पर्क करे ।
© 2024. All rights reserved.
