शब्द रे, तेरी बिरले परख करी

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12/30/20251 मिनट पढ़ें

शब्द रे, तेरी बिरले परख करी, शब्द रे, तेरी बिरले परख करी॥

पाँच पचीसों चढ़े बराती, पाँचों को लगन लगी।
ब्याहले के सिर मोड़ बंधाया, ब्याहले न ओढ़ी चुनड़ी॥
शब्द रे, तेरी बिरले परख करी, शब्द रे, तेरी बिरले परख करी॥

उल्टा भात खाने को आवे, मैंढ़े पे विपत पड़ी।
देखत डर गए सारे बराती, आगमि कौन घड़ी॥
शब्द रे, तेरी बिरले परख करी, शब्द रे, तेरी बिरले परख करी॥

कुएँ में एक हथिनी ब्याई, मछली पेड़ चढ़ी।
पनिहारी तो गागर डूब गई, करमा की मार पड़ी॥
शब्द रे, तेरी बिरले परख करी, शब्द रे, तेरी बिरले परख करी॥

पत्थर की एक नाव बनाई, ले मँझधार तरी।
खेवनहारा उलझ-पुलझ में, करमा की विपत हड़ी॥
शब्द रे, तेरी बिरले परख करी, शब्द रे, तेरी बिरले परख करी॥

मुर्दा घाट से चली रे अर्थी, ले श्मशान धरी।
बिन अग्नि के फूँकी नगरी, धाई यूँ काँप खड़ी॥
शब्द रे, तेरी बिरले परख करी, शब्द रे, तेरी बिरले परख करी॥

कहे रविदास सुनो रे साधो, लग गई शब्द जड़ी।
पिंड-प्राण सब भस्म भए, लग गई अगम लड़ी॥
शब्द रे, तेरी बिरले परख करी, शब्द रे, तेरी बिरले परख करी॥

🌿 निर्गुण दर्शन : गूढ़ व्याख्या

(पद: “शब्द रे, तेरी बिरले परख करी…”)

“शब्द रे, तेरी बिरले परख करी”

यहाँ शब्द सामान्य शब्द नहीं है।
यह है गुरु-शब्द, वह ध्वनि जो भीतर उतरते ही मैं को हिला देती है।

👉 “बिरले परख” का अर्थ—बहुत कम लोग शब्द को सुनते नहीं, सहते हैं

🔹 निर्गुण में शब्द को समझा नहीं जाता, उसमें जला जाता है

“पाँच पचीसों चढ़े बराती, पाँचों को लगन लगी”

पाँच = पाँच इंद्रियाँ
पचीस = प्रकृति के तत्त्व (तत्त्व-तंत्र)

👉 पूरा शरीर–मन विवाह में जुटा है—अर्थात संसार से बँधन

🔹 इंद्रियाँ विषयों से ब्याही जा चुकी हैं।

“ब्याहले के सिर मोड़ बंधाया, ब्याहले न ओढ़ी चुनड़ी”

ब्याहला = जीव
चुनड़ी = विवेक / लज्जा / सजगता

👉 जीव ने संसार का बंधन तो बाँध लिया, पर विवेक का वस्त्र नहीं ओढ़ा

🔹 यही अज्ञान का मूल है।

“उल्टा भात खाने को आवे, मैंढ़े पे विपत पड़ी”

उल्टा भात = संसार की उलटी बुद्धि
मैंढ़ा = अहंकार का घर

👉 जब सत्य उल्टा लगता है, तभी अहंकार पर आपदा आती है।

🔹 निर्गुण में सत्य हमेशा उलटा प्रतीत होता है।

“कुएँ में एक हथिनी ब्याई, मछली पेड़ चढ़ी”

यह शुद्ध उलटबाँसी है।

👉 जहाँ बुद्धि कहती है—असंभव, वहीं अनुभव घटता है

🔹 जब चेतना जागती है, तो नियम उलट जाते हैं।

“पनिहारी तो गागर डूब गई, करमा की मार पड़ी”

पनिहारी = साधक
गागर = साधन

👉 जो साधन को ही सत्य मान ले, वह डूब जाता है।

🔹 साधन छोड़ना ही साध्य है।

“पत्थर की एक नाव बनाई, ले मँझधार तरी”

यह निर्गुण का अत्यंत गहरा संकेत है।

पत्थर की नाव = देह / अहंकार

👉 अहंकार डूबता है, पर चेतना पार हो जाती है।

🔹 यह पार जाना मैं के डूबने से होता है।

“मुर्दा घाट से चली रे अर्थी, ले श्मशान धरी”

यह अहंकार की मृत्यु का दृश्य है।

👉 जीवित रहते मर जाना—
यही निर्गुण साधना का चरम है।

“बिन अग्नि के फूँकी नगरी, धाई यूँ काँप खड़ी”

अग्नि = प्रयास
👉 बिना प्रयास के भीतर सब जल गया।

🔹 यह अनुग्रह की अवस्था है।

“लग गई शब्द जड़ी, पिंड-प्राण सब भस्म भए”

शब्द-जड़ी = गुरु-वाणी का प्रहार

👉 देह-बोध और प्राण-बोध दोनों गल गए।

🔹 शेष रहा— शुद्ध निर्गुण बोध

🌸 अंतिम मर्म

जहाँ शब्द लगता है, वहाँ संसार टूटता है।

जो समझ गया, वह चूक गया।
जो जल गया, वही पार हुआ।

🌑 शब्द की परीक्षा

(एक निर्गुण रहस्य-कथा)

एक नगर था — नाम नहीं था उसका। क्योंकि जहाँ नाम हों, वहाँ पहचान होती है,
और जहाँ पहचान हो, वहाँ सत्य छुप जाता है। उस नगर में एक युवक रहता था। लोग उसे जीव कहते थे।
वह पढ़ा-लिखा था, पूजा करता था, व्रत रखता था —पर भीतर कहीं एक खालीपन था,
जैसे कोई आवाज़ उसे पुकार रही हो और वह समझ न पा रहा हो कि कौन बुला रहा है।

🔔 शब्द का आगमन

एक रात उसने स्वप्न में सुना—“शब्द रे… तेरी बिरले परख करी।” वह घबरा गया।
आवाज़ न स्त्री की थी, न पुरुष की।
न बाहर से आई थी, न भीतर से। सुबह उसने गुरु की खोज शुरू की।

👣 संत की राह

उसे बताया गया—“संत मिलन को चलिए।”

वह पहुँचा एक ऐसे साधु के पास जो न उपदेश देता था, न प्रश्नों के उत्तर।
सिर्फ देखता था — जैसे भीतर तक देख रहा हो।

युवक ने पूछा, “महाराज, मैं सत्य जानना चाहता हूँ।”

साधु मुस्कराया—“पहले देखो, तुम किससे बँधे हो।”

💍 विवाह का रहस्य

अचानक युवक ने देखा —उसके भीतर एक विवाह चल रहा है।

पाँच इंद्रियाँ बाराती बनी थीं, पचीस तत्त्व ढोल बजा रहे थे।

पर दूल्हा — वही युवक —नंगे सिर खड़ा था, विवेक की चुनड़ी ओढ़े बिना।

साधु ने कहा—“तू संसार से ब्याह तो रचाए बैठा है,
पर होश का वस्त्र नहीं पहना।” युवक काँप गया।

🔄 उलटी दुनिया

फिर साधु ने उसे एक नगर दिखाया
जहाँ लोग उल्टा भात खा रहे थे, जहाँ मछलियाँ पेड़ों पर चढ़ी थीं,
जहाँ कुएँ में हथिनी ने बच्चा जना था।

युवक चिल्लाया—“यह असंभव है!”

साधु बोला—“यही तेरी बुद्धि की सीमा है।
जहाँ बुद्धि हारती है, वहीं शब्द लगता है।”

🪨 पत्थर की नाव

साधु ने उसे नदी के किनारे लाकर कहा—“पार जाना है तो इस नाव में बैठ।” नाव पत्थर की थी।

युवक बोला— “यह तो डूब जाएगी!” साधु हँसा—“डूबेगी — तू।
नाव नहीं।”

डरते-डरते युवक बैठा। नदी के बीच पहुँचते ही
उसे लगा —वह स्वयं गल रहा है, नाम, पहचान, स्मृति — सब।

नाव पार पहुँच गई।

🔥 बिना अग्नि की जलन

किनारे पर कोई आग नहीं थी, फिर भी उसे लगा
कि भीतर की पूरी नगरी जल गई है।

कुछ भी बचा नहीं —न साधक, न साधना। बस शांति।

🕯️ अंतिम वचन

साधु की आवाज़ गूँजी—“लग गई शब्द जड़ी।
पिंड-प्राण सब भस्म भए।”

युवक झुका —पर झुकने वाला कोई न था।

🌕 कथा का रहस्य

यह कथा कहती है—

  • सत्य समझ से नहीं खुलता

  • वह मैं के गलने से प्रकट होता है

  • शब्द पढ़ा नहीं जाता

  • वह जीवन को जला देता है