तेरी कायनात, मेरे खाली हाथ
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2/21/20261 मिनट पढ़ें
तेरी कायनात, मेरे खाली हाथ
तेरी कायनात, मेरे खाली हाथ और तार-तार सपने,
गहरे ज़ख्म जाग उठे, मेरे सीने में आग, हर साँस तपने लगे।
तेरी कायनात, मेरे खाली हाथ और तार-तार सपने,
दर्द से चूर, ग़म का गुरूर — कहूँ क्या मैं हाल अपने?
आवारा, आवारा, आवारा अंगारा,
रातों में डूबा अंबर का बंजारा।
जाने टूटा क्यों — मैं शीशा, न तारा।
तेरी कायनात, मेरे खाली हाथ
और तार-तार सपने।
गहरे ज़ख्म जाग उठे, मेरे सीने में आग,
हर साँस तपने लगे।
कोई उधारी है, सीने पर भारी है,
पत्थर है या दिल है?
मैं ही अकेला हूँ, मैं ही तो मेला हूँ —
यह कैसी महफ़िल है?
रूठे सवेरे हैं, आधे ये मेरे हैं,
आधे हैं ये तेरे।
तू है निगाहों में, लावा है आहों में,
पर सर्द शाम घेरे।
आवारा, आवारा, आवारा अंगारा,
आँसू हैं मेरे या पिघला है पारा?
जाने टूटा क्यों — मैं शीशा, न तारा।
मेरे इम्तिहान तू जो ले रहा है,
अब न रियायतें कर।
मैंने इश्क़ सीखा, मैंने प्यार सीखा,
तू चाहे नफ़रतें कर।
मैंने दिल दिया है, मैंने दुख लिया है,
तू सौदा ही मान ले पर।
मेरे इम्तिहान तू जो ले रहा है,
अब न रियायतें कर।
आवारा, आवारा, आवारा अंगारा,
रातों में डूबा अंबर का बंजारा।
जाने टूटा क्यों — मैं शीशा, न तारा।
मेरे इम्तिहान तू जो ले रहा है,
अब न रियायतें कर।
मैंने इश्क़ सीखा, मैंने प्यार सीखा,
तू चाहे नफ़रतें कर।
यह गीत केवल प्रेम-विरह की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि आत्मा और परम सत्ता के बीच चल रहे एक गहन संवाद का संकेत देता है। यदि इसे आध्यात्मिक दृष्टि से देखें, तो हर पंक्ति साधक की आंतरिक यात्रा का प्रतीक बन जाती है।
१. “तेरी कायनात, मेरे खाली हाथ और तार-तार सपने”
कायनात — यह सम्पूर्ण सृष्टि, ईश्वर की लीला है।
मेरे खाली हाथ — अहंकार का टूट जाना।
जब साधक जीवन की दौड़ में सब कुछ पाकर भी भीतर खाली रह जाता है, तब उसे समझ आता है कि बाहरी उपलब्धियाँ माया हैं।
तार-तार सपने — मन द्वारा रचे गए इच्छाओं के जाल का विघटन।
आध्यात्मिक पथ पर पहला कदम यही है — सपनों का टूटना, क्योंकि जब तक कल्पनाएँ जीवित हैं, सत्य नहीं प्रकट होता।
२. “गहरे ज़ख्म जाग उठे, मेरे सीने में आग”
यह तपस्या की अग्नि है।
जब भीतर प्रश्न उठता है — “मैं कौन हूँ?” — तब पुरानी धारणाएँ जलने लगती हैं।
सीने की आग वास्तव में आत्मा की पुकार है।
दर्द यहाँ दंड नहीं, बल्कि शुद्धि की प्रक्रिया है।
३. “आवारा अंगारा, रातों में डूबा अंबर का बंजारा”
आवारा — जो किसी बंधन में नहीं।
अंगारा — चेतना की ज्वाला।
अंबर का बंजारा — आत्मा, जो अनंत आकाश की यात्री है।
यह पंक्ति कहती है कि आत्मा मूलतः स्वतंत्र है, परन्तु संसार के अंधकार में भटक रही है।
वह तारा नहीं (स्थिर प्रकाश), बल्कि शीशा है — जो टूट भी सकता है, और प्रतिबिंब भी दे सकता है।
४. “मैं ही अकेला हूँ, मैं ही तो मेला हूँ”
यह अद्वैत की झलक है।
जब साधक भीतर उतरता है, तो पाता है —
अकेलापन भी वही है, भीड़ भी वही है।
द्रष्टा और दृश्य में भेद मिटने लगता है।
यह वही अनुभूति है जो कहती है:
“जो बाहर खोज रहा था, वह भीतर ही था।”
५. “रूठे सवेरे हैं…”
रूठा हुआ सवेरा — चेतना की अधूरी जागृति।
आधा मेरा, आधा तेरा — अभी पूर्ण समर्पण नहीं हुआ है।
जब तक “मैं” शेष है, तब तक प्रभु पूर्ण रूप से प्रकट नहीं होते।
६. “आँसू हैं मेरे या पिघला है पारा?”
यह गहन प्रतीक है।
आँसू — करुणा और भक्ति।
पारा — मन की चंचलता।
साधक पूछता है —
क्या यह रोना अहंकार का है या आत्मा का पिघलना?
७. “मेरे इम्तिहान तू जो ले रहा है…”
यह ईश्वर से शिकायत नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण का स्वर है।
वह कहता है —
“मैंने प्रेम सीखा है, अब तुम चाहे कठोरता करो, मैं प्रेम नहीं छोड़ूँगा।”
यह भक्ति की पराकाष्ठा है —
जहाँ प्रेम प्रतिफल की आशा नहीं करता।
समग्र आध्यात्मिक अर्थ
यह सम्पूर्ण रचना एक साधक की यात्रा है:
1. सपनों का टूटना
2. अहंकार का जलना
3. अकेलेपन का अनुभव
4. भीतर की अग्नि में तपना
5. अंततः समर्पण
यह गीत कहता है —
जब तक तुम शीशा हो, टूटोगे।
जब तारा बन जाओगे, स्वयं प्रकाश हो जाओगे।
और तारा बनने का मार्ग है —
दर्द को स्वीकार करना,
अहंकार को त्यागना,
और प्रेम में स्थिर रहना।
सूफ़ी संवाद : “आवारा अंगारा”
एक वीरान दरगाह के आँगन में रात गहरी हो चुकी थी।
चाँद बादलों में छिप-छिप कर झाँक रहा था।
एक बेचैन रूह — मुरीद — अपने पीर के सामने बैठी थी।
मुरीद:
पीर-ए-मुरशिद…
“तेरी कायनात, मेरे खाली हाथ और तार-तार सपने…”
यह दिल इतना खाली क्यों है, जब दुनिया तेरी नेमतों से भरी है?
पीर:
ऐ दिल के मुसाफ़िर,
खाली हाथ होना ही पहली नेमत है।
जिसके हाथ भरे होते हैं, उसमें रब की जगह कहाँ बनती है?
तेरे सपने तार-तार हुए —
क्योंकि तू सच की दहलीज़ पर पहुँच गया है।
मुरीद:
“मेरे सीने में आग है, हर साँस तपती है…”
यह आग क्यों दी उसने?
क्या इश्क़ इतना सख़्त होता है?
पीर (मुस्कुराकर):
इश्क़ आग ही तो है।
जो जला न दे, वह इश्क़ कैसा?
यह आग तेरे गुनाहों की नहीं,
तेरे “मैं” की है।
जब “मैं” जलेगा, तभी “वो” बचेगा।
मुरीद:
मैं अपने आपको “आवारा अंगारा” महसूस करता हूँ।
ना तारा हूँ, ना मुकम्मल रोशनी।
टूटा हुआ शीशा हूँ…
पीर:
तू शीशा है, इसलिए टूट रहा है।
तू तारा बनेगा, जब खुद को भूल जाएगा।
शीशा रोशनी को पकड़ना चाहता है,
तारा खुद रोशनी बन जाता है।
तू अभी तलाश में है,
जबकि वो तेरे ही सीने में बैठा है।
मुरीद:
“मैं ही अकेला हूँ, मैं ही तो मेला हूँ…”
यह कैसा राज़ है?
पीर:
जब तक तू खुद को जिस्म समझता है,
तू अकेला है।
जब खुद को रूह जान लेता है,
तू पूरी कायनात है।
अकेलापन परदा है,
मेला हक़ीक़त है।
मुरीद (आँखें भीग जाती हैं):
“आँसू हैं मेरे या पिघला है पारा?”
मैं रोता क्यों हूँ?
पीर:
यह आँसू तेरी कमज़ोरी नहीं,
तेरी राह हैं।
जब दिल पिघलता है,
तो आँखों से दरिया बहते हैं।
रूह का सफ़र सूखा नहीं होता,
वो भीगकर ही मुकम्मल होता है।
मुरीद:
“मेरे इम्तिहान तू जो ले रहा है…”
क्या वह सच में मेरी परीक्षा ले रहा है?
पीर (गंभीर होकर):
वो इम्तिहान नहीं लेता,
वो परतें हटाता है।
हर दर्द एक परदा हटाता है।
हर ठोकर एक नक़ाब गिराती है।
तू कहता है — “रियायत न कर”
यह इश्क़ की बुलंदी है।
जब बंदा कहे —
“तू चाहे नफ़रत कर, मैं इश्क़ ही करूँगा”
तब समझ ले,
रब मुस्कुरा रहा है।
मुरीद (धीरे स्वर में):
तो क्या मैं कभी तारा बन पाऊँगा?
पीर:
जब तू पूछना छोड़ देगा।
जब तू टूटने से डरना छोड़ देगा।
जब तू कहेगा —
“मैं नहीं, बस तू”
तभी अंगारा सूरज बन जाएगा।
रात और गहरी हो गई।
मुरीद की आँखें बंद थीं।
अब सीने की आग जलन नहीं थी —
वो उजाला बन चुकी थी।
और पीर की आवाज़ हवा में घुल गई—
“इश्क़ में जो जलता है,
वही रोशनी बनता है…”
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