विचारों के बीच का मौन

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2/5/20261 मिनट पढ़ें

विचारों के बीच का मौन

“विचार से विचार के बीच का अंतराल ही ध्यान है”
यह वाक्य बहुत गहरा है।
ध्यान कोई नया विचार नहीं है।
ध्यान उस क्षण का नाम है जहाँ—

  • एक विचार समाप्त हो चुका है

  • अगला विचार अभी पैदा नहीं हुआ

उस छोटे से मौन में
न स्मृति है
न कल्पना
न भविष्य
बस होना है।

वही क्षण ध्यान है।

ध्यान करना नहीं, ध्यान को पहचानना है
अक्सर हम सोचते हैं—
“विचार रोकने होंगे”
लेकिन विचार रोकने वाला भी एक विचार ही है।

वास्तविक ध्यान में
आप कुछ करते नहीं
आप केवल सचेत दर्शक बनते हैं।

  • विचार आए — देखें

  • विचार जाए — देखें

  • बीच में जो शून्यता है — उसे भी देखें

यहीं से अंतराल स्वतः फैलने लगता है।

अंतराल बढ़ाने का प्रयास नहीं, सजगता का विस्तार
यदि आप जानबूझकर अंतराल बढ़ाने की कोशिश करेंगे
तो मन फिर नियंत्रण में आ जाएगा।

लेकिन यदि आप केवल

“जो हो रहा है, उसे बिना हस्तक्षेप देखूँ”

तो विचारों के बीच का मौन
स्वतः लंबा होने लगता है।

यह बिल्कुल वैसा है जैसे—
जब पानी को हिलाना बंद कर देते हैं,
तो तल अपने आप दिखाई देने लगता है।

दृष्टा बने रहना — साधना का केंद्र
जब आप विचार नहीं होते
बल्कि विचारों को देखने वाले होते हैं,
तभी ध्यान गहराता है।

यही दृष्टा भाव है।

  • शरीर में संवेदना — देखी जा रही है

  • मन में विचार — देखे जा रहे हैं

  • भावनाएँ — देखी जा रही हैं

जो देख रहा है, वह इन सबसे अलग है।
उसी का नाम आत्म-साक्षी है।

जहाँ अंतराल स्थिर हो जाए, वहीं समाधि की शुरुआत
जब विचारों के बीच का मौन—

  • क्षणिक न रहकर

  • स्वाभाविक

  • और स्थिर हो जाए

तब वहाँ कोई “मैं ध्यान कर रहा हूँ” नहीं बचता।
वहाँ सिर्फ शुद्ध उपस्थिति रह जाती है।

यही समाधि का मार्ग है—
कोई लक्ष्य नहीं
कोई प्रयास नहीं
केवल पूर्ण सजगता।

संक्षेप में

  • विचारों का प्रवाह = मन

  • विचारों के बीच का मौन = ध्यान

  • मौन में जागरूक बने रहना = साधना

  • जागरूकता में विलय = समाधि

छोटी ध्यान-प्रक्रिया: विचारों के बीच का मौन

समय: 7–10 मिनट
स्थान: जहाँ आप अभी हैं, वही पर्याप्त है

1. बैठना — कुछ बदलने की ज़रूरत नहीं

सीधे बैठें या सहज।
आँखें हल्की बंद हों या आधी खुली।
शरीर जैसा है, वैसा ही रहने दें।

बस यह जान लें—

“अभी कुछ करना नहीं है।”

2. श्वास को देखना — नियंत्रित नहीं

साँस आ रही है — जानिए
साँस जा रही है — जानिए

गिनती नहीं।
गहराई नहीं बदलनी।
सिर्फ जानना

3. विचार आएँ — रोकें नहीं

कोई विचार आए—
उससे लड़ें नहीं, पकड़ें नहीं।

बस भीतर ही कहें—

“यह एक विचार है।”

विचार को जाने दें,
जैसे बादल आकर निकल जाते हैं।

4. दो विचारों के बीच रुकना

अब ध्यान दें—

एक विचार गया…
अगला अभी आया नहीं…

इस बीच को महसूस करें।
कुछ मत करें।
बस वहाँ ठहरें

यही ध्यान है।

5. दृष्टा बने रहना

यदि मन कहे—
“अरे, अभी तो शांत था!”

तो मुस्कुरा कर देखें—
यह भी एक विचार है।

आप शांति नहीं हैं,
आप शांति को जानने वाले हैं।

6. समाप्ति — धीरे

आँखें खोलें।
शरीर को महसूस करें।
बिना जल्दी के उठें।

यह जान लें—

ध्यान खत्म नहीं हुआ, बस रूप बदला है।

स्मरण रखें

  • विचार शत्रु नहीं हैं

  • मौन उपलब्धि नहीं है

  • साक्षी होना प्रयास नहीं, स्वभाव है

दिन में कभी भी
2–3 साँसों तक भी
यदि आप विचारों के बीच जागरूक रह गए—
वही पर्याप्त है।

लघु कथा — मौन का उपदेश

एक वनाश्रम में संध्या का समय था।
सूर्य अस्त हो रहा था, और आकाश के रंग शांत हो चले थे।
शिष्य ने गुरु के चरणों में बैठकर पूछा—

शिष्य:
गुरुदेव, मन बहुत चंचल है।
विचारों का अंत नहीं होता।
ध्यान कैसे करूँ?

गुरु ने उत्तर नहीं दिया।
उन्होंने पास रखे जल-पात्र की ओर संकेत किया।

शिष्य ने देखा—
पात्र में जल था, पर सतह पर हल्की तरंगें थीं।

गुरु:
जब पवन रुकेगा, तब क्या होगा?

शिष्य:
तरंगें शांत हो जाएँगी।

गुरु मुस्कराए।

गुरु:
तरंगें शांत करने का प्रयास मत करना।
पवन को देखने वाला बनो।

शिष्य मौन हो गया।

कुछ क्षण बीते।
एक पक्षी बोला, फिर चुप हो गया।
उस चुप्पी में कुछ था—अव्यक्त, पर स्पष्ट।

गुरु ने धीरे से कहा—

गुरु:
जहाँ एक विचार जाता है
और दूसरा अभी नहीं आता—
वहीं तू है।

शिष्य चकित हुआ।

शिष्य:
तो क्या वही ध्यान है?

गुरु:
ध्यान वहाँ नहीं,
जहाँ तू कुछ करता है।
ध्यान वहाँ है,
जहाँ तू होना पहचान लेता है।

शिष्य की आँखें बंद हो गईं।
एक विचार उठा…
फिर विलीन हो गया…

बीच में जो शांति थी,
उसमें कोई प्रश्न नहीं था।

गुरु ने अंतिम वाक्य कहा—

गुरु:
मन विचारों का प्रवाह है,
ध्यान उनके बीच का मौन,
और जो उस मौन को जानता है—
वही ब्रह्म है।

संध्या गहरी हो गई।
शिष्य ने प्रणाम किया।
अब प्रश्न शेष नहीं थे—
केवल जागरूकता थी।

इति उपनिषद् भावः